लेकर के कर्जों के बोझ कधों पर
हम सपनों का आशियाना बसाने चले,
आशियाने से दुर, खुद को मसल कर
हम कर्जों के बोझ उतार ते चले|
लेकर के कर्जों के बोझ कधों पर
हम सपनों का आशियाना बसाने चले,
आशियाने से दुर, खुद को मसल कर
हम कर्जों के बोझ उतार ते चले|