जादू का बटुआ ऋत्विक., February 7, 2026February 9, 2026 कई साल से घर में एक जादूई बटुआ था। कहां से आया? कब आया? किसी को पता न था। धागे निकल आ रहे थे, झुर्रियां भी काफी थी, पर अब भी टिका हुआ था। ज्यादा महंगा भी शायद ही होगा, लेकिन कागजात और रसीदो से भरा रहता था। पैसे भी ज्यादा नहीं थे उसमे, पर मेरी और मेरे परिवार की हर ख्वाहिश पूरी करता था। कई साल से घर में एक जादूई बटुआ था, मेरे पापा का बटुआ। Poems
Poems गम February 7, 2026February 7, 2026 खुशियाँ तो हमें मिली थी,लेकिन शिद्दत से गले हमें सिर्फ गम ने लगाया। Read More
Poems ठोकरें August 5, 2025August 10, 2025 सौ ठोकरें खाके दुनिया से, हम ने भी कुछ सीखा है, अब मंजूर हैं हमें… Read More
Poems मैं लड़ तेरे लिए रहा हूँ ! July 29, 2024August 4, 2024 मैं लड़ तेरे लिए रहा हूँकभी खुद से तो कभी दुनिया से,मैं लड़ तेरे लिए… Read More