जब रात में घर आकर,
टाई को ढीला करते हुए आईने में खुद को देखते हो
अपने आप से नज़रें मिलाते हो
क्या खुद को पहचान लेते हो तुम?
क्या अब भी वही हो तुम?
जब दिन भर,
कंधों पर उठाई हुई जिम्मेदारियों को उतारते हो,
क्या जवानी में देखे हुए ख्वाबों को
पलकों से हटा लेते हो तुम?
क्या अब भी वही हो तुम?
जब किश्तों की प्यास बुझा कर,
थके-हारे, कमरे में अकेले बैठ,
पानी की दो घूँट पी जाते हो
तब अपने आप से कौन सा झूठ बोलते हो तुम?
क्या अब भी वही हो तुम?
क्या अब भी वही हो तुम?
जो सुबह घर से निकले थे।